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● जिस बात का गुमा था, उसी बात का शिला है।

 ● जिस बात का गुमा था, उसी बात का शिला है।

एक बेजुबाँ है रास्ता, एक आधा दिया मिला है।
एक आरजू थी मुझे, की उसके सारे खते जला दु।
उसके खतो में थी मोहब्बत, मेरा दिल वही चला है।
मेरे जख्म चीखते है, और हालात पूछते है।
मेरे नम हुई आंखों में, उतरा हुआ चहरा।
सब गम की सिलवटों को, बार बार देखती है।
इन उदास रातो को, दर्द भरी बातो को।
इन मुख्तसर के किस्सों को, गजलो में पिरोते है। 
हम दर्द में चलते है, और खुद से ही लड़ते हैं।
हम एक उम्र तन्हाई, एक शेर में लिखते है।
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● सहारा जला दिया, तेरे जुस्तजू के बाद।
सब कुछ भूला दिया, तेरे आरजू के बाद।
और फिर तामाम उम्र किसी से बात नही की,
तेरे रूठने के बाद, तेरे गुफ्तगू के बाद।
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● मै तन्हा हु मैं इस बात से खुश हूं,
कम से कम झूठ से दूर सच के पास हु।

                            ✍🏻 Writer_Abhi

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